विभाग का संक्षिप्त इतिहास



सहकारिता के क्षेत्र में दुग्धशाला विकास कार्यक्रमों का अपना एक गौरवशाली इतिहास है। सर्वप्रथम वर्ष 1917 में 'कटरा सहकारी दुग्ध समिति इलाहाबाद' की स्थापना के साथ प्रदेश में ही नहीं वरन् देश में भी यह पहला अवसर था कि जब दुग्ध व्यवसाय के क्षेत्र में सहकारिता का प्रादुर्भाव हुआ परन्तु अगले दो दशकों में इस दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। वर्ष 1938 में देश के प्रथम दुग्ध संघ 'लखनऊ दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लि०' की स्थापना उत्तर प्रदेश की राजधानी, लखनऊ में हुई।

प्रदेश में दुग्धशाला विकास को गतिशील बनाने की दिशा में वर्ष 1962 में प्रादेशिक  कोआपरेटिव डेरी फेडरेशन लि०, की स्थापना एक तकनीकी सलाहकार संस्था के रूप में की गयी थी। वर्ष 1970-71 में आपरेशन फ्लड-1 योजना प्रदेश के 8 जनपदों में लागू की गयी जिसकी क्रियान्वयन एजेन्सी इस संस्था को बनाया गया।

मात्र 8 जनपदों में सीमित होने के कारण ओ०एफ०-1 योजना का इस कार्यक्रम पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। फलत: उत्तर प्रदेश शासन का ध्यान दुग्धशाला विकास के विस्तारीकरण की ओर गया और दुग्धशाला विकास कार्यक्रम को गतिशील बनाने के उद्देश्य से प्रदेश सरकार द्वारा "उत्तर प्रदेश दुग्ध अधिनियम, 1976" पारित कर वर्ष 1976 में एक पृथक विभाग के रूप में दुग्धशाला विकास विभाग की स्थापना कर दुग्ध आयुक्त का पद सृजित किया गया। दुग्ध आयुक्त को सरकारी अधिनियम एवं इसके अधीन बने नियमों के अन्तर्गत दुग्ध सहकारिताओं के संबंध में निबन्धक के अधिकार प्रदत्त किये गये तथा इन्हें विभागाध्यक्ष  व राज्य दुग्ध परिषद का सचिव भी नियुक्त किया गया। वर्तमान में उत्तर प्रदेश भारत में सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन करने वाला प्रदेश है।